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July 21, 2014

आवारा बंजारा :एक कोशिश

बेजारी का जिस्म लिए,
मैं फिरता आवारा बंजारा,
बे अदबी की ठोर लिए,
मैं फिरता तनहा बंजारा.................

किसका सानी, कहा को पानी,
जुग जगहा की रहे निशानी,
मैं भीड़ भाड़ से दूर खड़ा,
इस जग की सब है ठुकरानी.......

......वो बात कही की और रही,
रण जंग मैं मेरी भोर बही,
प्रेम रश, बदन कश,
मेरी जवानी है मस्तानी……..
नैनो को पाशो से बंधती है,
होंटो के हांशो से ठनती है,
मैं मूकबधिर हू अंजाना,
अनजानी रहो का हू मारा,
बेजारी का जिस्म लिए,मैं,
 फिरता आवारा बंजारा………………………………………..

कदम मेरे है, ठाप नहीं,
सकल मेरी, पर मैं आप नहीं,
ऐसो के खून में रंगा हू,
कपड़ो में हू पर नंगा हू,
ये एक कहानी हो तो कहु,
मेरी ही जुबानी हो तो कहु,
यहाँ का हू वहा का हू,
मेरा देश बचाओ मैं जहा का हू………………………………..


माट्टी ये मेरी सोंधी है,
वीरो के खून से ज्योंदी है,
ये चार खड़े है लोग वहा,
मांगे है जिनने वोट यहाँ,
बातो में माँ को बेचा है,
हाथो से खुदको सींचा है..................

ये तेरे है मेरे है,
अपने ही घर के लुटेरे है…………………………………..

अब कौन यहाँ जो रण लेगा,
हाथ उठा के प्रण लेगा,
जुग में ये शान बचानी है,
के हममे भी अभी जवानी है…………………………………….

राणा कि हठ में बंध जाओ,
मीरा के कंठ में मत गाओ,
अबला कि कौन है सुनता यहाँ,
तबले की तान पर संग आओ,
अभी वख्त खड़ा है साथ यहाँ,……………………………….

देश बदलने का दिन है आया,
क्या खून ने तेरे पलटी मारी?????
क्यों सोये हो,
क्यों रोये हो,
पग पग पे जाल बिछोये हो,
कभी जाती धर्म पे बाट रहे,
चुपके से जेबे काट रहे,
दीन कोई, देवता कोई,
सब अपनी ही मजदूरी खाता है,
ये सफ़ेद पोश है खुदा नहीं,
जो हममे उन्नति दिलाता है……………………………………………………..

वो सफ़ेद पोश है सोच रहे,
कितना में हांके जाता हू,
ये बात उन्हें भी ध्यान रहे,
उनको भी होश दिलाता हू,
अपने कर्मो की राह बदल,
सफ़ेद चोगे को दूर पटक,
कर काम नैक, जो नेकी बाकि,
नहीं तो पीछे है तेरे दुनिया आती......

बदलेगा मेरा राष्ट्र यही,
फूटेगी नयी क्रांति,
हर सीने में आग सा जलता है,
मेरा देश ही भला क्यों नहीं बदलता है?
ये सन्देश लिए में आया हू,
मैं राणा के रण का जाया हू,
मैं फिरता आवारा बंजारा,
बे अदबी कि ठोर लिए, मैं फिरता तनहा बंजारा…………………………………………………


राकेश कुमार वर्मा 



July 19, 2014

teri hi pyash

हर पल एक सवेरे की तलाश रहती है, 
मेरी सीने में आज भी तेरी ही प्यास रहती है,

तेरे चिलमन में तारे हजारो है साथी,
लेकिन इस आँगन में तो सन्नाटो कि बरसात रहती है,

हर एक कदम तेरी और दौड़ जाता है,
मेरी रूह आज भी उदाश  रहती है,

जो यहाँ उमड़ते है तुफानो कि तरह अरमान दिलके,
आज भी मेरे आन्खो में  तेरी ही तलाश रहती है,

कैसी ये मुकदर- ए-मुहबत है साथी,
तेरी बेवफाई जानकर भी, सूरत-ए-दीदार ख्वाबो में साथ रहती है,

अश्को कि धारा से, न पूछ मंजरे-ए-इशक़ मेरा,
माहौल-ए-ख़ुशी में भी गम की बिसात रहती है,

देख तेरे होने का सब्बक् इतना है,
इस दिल में अब भी तेरी ही आश रहती है,

दास्तान ये दिल की जुबान-ए-शरीख़ तो करदु मै,
लेकिन  तकलीफे मुहबत तेरा ही अहसास कहती है,

सोचता हूँ तू भी कही ऐसी ही वीरानियो का संगी होगा,
इसी लिए मेरे दिल की हर एक आवाज कहती है,

"हर पल एक सवेरे की तलाश रहती है, 
मेरी सीने में आज भी तेरी ही प्यास रहती है......................"

राकेश कुमार वर्मा

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